चेतना न्यूज़

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इंदौर। [चेतना न्यूज] कुश्ती लड़ते हुए दिवंगत हुए मध्य प्रदेश के हिन्दकेसरी पहलवान रवि बारोट (26 वर्ष) की तेरहवीं में शामिल होने अर्जुन अवार्डी पहलवान कृपाशंकर बिश्नोई उनके निवास ग्राम हरसौला पहुचे | बताते हैं कि उनके पिता गजानंद पहलवान भी अपने जमाने के ख्याति प्राप्त पहलवान रहे हैं। हर साल की भाति इस बार भी 25 सितम्बर को ग्वालियर के पास लहार जनपद के रावतपुरा धाम में राज्यस्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था | इस प्रतियोगिता में देशभर के पहलवान अपने दांव पेंच दिखाने आए थे। इसमें मध्यप्रदेश हिंद केसरी रहे रवि कुमार भी शामिल हुए थे। रवि ने इस प्रतियोगिता में दो कुश्तियां लड़ी। साथ ही दोनों में विजयी रहे। लेकिन अचानक उनकी हालत खराब हुई। जब तीसरी कुश्ती के लिए उन्हें बुलाया गया तो उन्होंने अखाड़े में कूदने से मना कर दिया | इसके बाद उन्हें चौथी बार फिर आवाज दी तो वे अखाड़े में आए। लेकिन अचानक उन्हें उल्टियां होने लगी और वे बेहोश हो गए। उन्हें आनन फानन में लहार अस्पताल लाया गया। जहां डाॅक्टर्स ने उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद ग्वालियर रैफर कर दिया। जहां रास्ते में उसकी मौत हो गई। कृपाशंकर कहा पिछले वर्ष राष्ट्रीय सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप में हिस्सा लेने आए ओलिंपियन और सितारा पहलवानों के बीच अचानक प्रशंसकों और मीडिया की निगाहें हरसौला जैसे छोटी जगह के पहलवान रवि बारोड पर टिक गईं। रवि ने भले ही इंदौर में आयोजित राष्ट्रीय कुश्ती चेम्पियनशिप 2018 में कांसा जीता हो, लेकिन मेजबान प्रदेश के लिए पदक जीतने वाले एकमात्र पुरुष पहलवान थे । कृपाशंकर ने कहा हम्माल पिता ने इनामी कुश्ती लड़ बेटे रवि को बनाया था पहलवान | पिता ओर पुत्र दोनों दंगल में कुश्ती खेल कर अपनी व परिवार की खुराक व्यवस्था करते थे कई बार एक ही दंगल में पिता गजानंद जिस पहलवान से हार जाते थे तो बेटा रवि उसी पहलवान पर जित दर्ज करता था पिता का हारना बेटे को पसंद नहीं था और यह बात रवि को बिलकुल अच्छी नहीं लगती थी इसी लिए पिता गजानंद ने कुश्ती खेलने से संन्यास ले लिया था | रवि ने जीत के बाद यह पदक अपने पिता को समर्पित किया था, जिन्होंने बेहद गरीबी के बावजूद उन्हें पहलवान बनाने में कसर नहीं छोड़ी। चर्चा के दौरान स्वर्गीय रवि पहलवान के पिता गजानंद बोले मैं हम्माली करता था। गेंहू और सोयाबीन के गोडाउन में गाडियों पर बोरियां उतारता हूं। जब रवि छोटा था तो कमाई करीब ढ़ाई हजार थी। इतने में चार बच्चों का घर चलाना मुश्किल था। इसलिए गांव-गांव छोटी-छोटी कुश्तियां भी लड़ने से मना नहीं किया, जहां जीतने पर 100 या 200 रुपए के इनाम मिलते थे। सोचता था कुछ दिन का घर खर्च निकलेगा । मुझे खुशी मिली थी कि मेरे बेटे ने मेरी मेहनत बेकार नहीं जाने दी । उन्होंने आगे कहा रवि अब पंजाब में अभ्यास करता था। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा, "मैट की कुश्ती में पैसा नहीं मिलता। मप्र में मिट्टी के दंगल कम होते हैं। पंजाब में बहुत दंगल होते हैं, जिन्हें लड़ने से पैसा मिलता है। इसी कमाई से कुछ पैसा घर भेजता था, कुछ से अपना और खुराक का खर्च निकालता था। गजानंद ने कहा- 2005 में जब पहली बार रवि पंजाब जा रहा था तो पता चला 6 हजार रुपए महीना खर्च आएगा, लेकिन मेरे लिए बड़ी मुश्किल से 2800 ही इकट्ठा कर सका। फिर मेरा बेटा इतने पैसे लेकर ही पंजाब पहुंचा। बाद में भी पैसों की तंगी हमेशा रही। उसका वजन कम था तो उसे छोटी कुश्ती मिलती थी, लेकिन उससे दूध का खर्च निकल जाता था। मजदुर पिता के बेटे 24 साल के रवि बीकॉम कर चुके थे। 17 साल की उम्र से सीनियर राष्ट्रीय स्पर्धा खेल रहे थे। 2011 में रांची नेशनल गेम्स में कांस्य जीता था। 2010 में पहली बार मप्र केसरी बने। तब से लेकर अब तक करीब 10 बार मप्र केसरी और महापौर केसरी बन चुके थे।


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